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सारंडा जंगल में नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा घिरा, सुरक्षाबलों ने कसा शिकंजा, 50 माओवादियों पर दबाव

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झारखंड के सारंडा जंगल में सुरक्षाबलों ने कुख्यात नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा को घेर लिया है। करीब 50 माओवादियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है और ऑपरेशन जारी है।

झारखंड के घने और दुर्गम सारंडा जंगल में नक्सल विरोधी अभियान ने एक बड़ा मोड़ ले लिया है, जहां वर्षों से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना कुख्यात नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा अब खुद सुरक्षाबलों की घेराबंदी में फंस चुका है और उसकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। बताया जा रहा है कि एक करोड़ रुपये के इनामी इस नक्सली कमांडर को पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा क्षेत्र में चारों ओर से सुरक्षा बलों ने घेर लिया है, जहां उसके साथ करीब 50 माओवादियों का समूह मौजूद है और उनके सभी संभावित भागने के रास्तों को पूरी तरह सील कर दिया गया है। यह पूरा इलाका अब सुरक्षा बलों के कड़े नियंत्रण में है, जहां सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर के जवान लगातार संयुक्त अभियान चला रहे हैं। घेराबंदी इतनी मजबूत है कि नक्सलियों के लिए बच निकलना लगभग असंभव माना जा रहा है क्योंकि ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमाओं पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है ताकि कोई भी नक्सली वहां भागकर छिप न सके। लगातार चल रहे इस अभियान ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है और उनके पास हथियार और रसद दोनों की भारी कमी हो गई है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जंगल में छिपे नक्सली अब खाने-पीने की सामग्री के लिए आसपास के गांवों पर निर्भर होने लगे हैं और यह साफ संकेत है कि उनका नेटवर्क कमजोर पड़ चुका है। कभी सुरक्षित ठिकाना माने जाने वाले सारंडा के जंगल अब उनके लिए जाल बन चुके हैं जहां हर दिशा में जवान तैनात हैं और धीरे-धीरे घेरा और भी सिकुड़ता जा रहा है। इस दौरान सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच रुक-रुक कर मुठभेड़ की स्थिति भी बनी हुई है, जिसमें हाल ही में आईईडी विस्फोट के कारण कुछ जवान घायल भी हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद अभियान की गति में कोई कमी नहीं आई है। मिसिर बेसरा लंबे समय से पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो का प्रमुख कमांडर माना जाता रहा है और कई बड़ी नक्सली घटनाओं में उसकी भूमिका रही है, लेकिन अब जिस तरह से उसे घेरा गया है, उससे सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह उसके नेटवर्क के अंत की शुरुआत हो सकती है। मौजूदा हालात में उसके सामने या तो आत्मसमर्पण करने या मुठभेड़ में मारे जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है क्योंकि लगातार दबाव और संसाधनों की कमी ने उसे कमजोर कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम का भावनात्मक पहलू यह भी है कि उसके परिवार ने भी उसे कई बार आत्मसमर्पण की अपील की है और उसका बेटा, जो दक्षिण भारत में नौकरी करता है, लगातार उसे सामान्य जीवन में लौटने की गुहार लगा रहा है। सरकार की ओर से भी नक्सलवाद के खात्मे के लिए चलाए जा रहे अभियानों के बीच यह ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश में अब कुछ ही बड़े नक्सली चेहरे बचे हैं और मिसिर बेसरा उनमें से एक है। ऐसे में सारंडा जंगल में चल रहा यह अभियान नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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